3732722834590626" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js" script data-ad-client="ca-pub-3732722834590626" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js" Vijay Raj Lalawat

Friday, August 21, 2020

गुमनामियाँ

गुमनामियाँ भी अच्छी है सब बदमाशियाँ छुपी रहती है 

हर वो शख़्स बदनाम है 

जो मशहूर हुआ ।

              विजयराज लालावत

Monday, August 17, 2020

अख़बार

कहीं वफ़ाओं की बातें कहीं बारूद के असले थे 

वो अख़बार रद्दी के भाव बिका जिसमें करोड़ों के मसले थे 

                विजयराज लालावत                   

Friday, August 14, 2020

तजुर्बे

 हम कहाँ अपनी मर्ज़ी से मुँह खोलते हैं

ये तो कमबख़्त तजुर्बे हैं जो वक़्त बेवक्त बोलते हैं।

             विजयराज लालावत

Saturday, August 8, 2020

सियासत

 यही होती है अहदे सियासत की चाल 

बंद आँखों में रख देते हैं रोशन ख़याल 

                          अज्ञात 

ग़मगीनी

 लगता है बहुत ग़मगीनी में दिन बिताते हो,

ये जो बात बात पे मुस्कुराते हो । 

                विजयराज लालावत 

Wednesday, August 5, 2020

इश्क़

इस इश्क़ की दुनिया के क़ायल सभी हैं
कोई बता देता है कोई छिपा लेता है 
पर घायल सभी है ।
                              अज्ञात 

Saturday, August 1, 2020

बदनामिया

खुदा बचाये इन महबूब कि गलियों से
बदनामियां भी मिलती है मशहूर होने के बाद
                                विजयराज लालावत 

निर्भय

तुलसी भरोसे राम के निर्भय हो के सोय  अनहोनी होनी नहीं होनी होय सो होय ।                                      तुलसीदास जी