3732722834590626" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js" script data-ad-client="ca-pub-3732722834590626" async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js" Vijay Raj Lalawat: ग़िला

Thursday, July 16, 2020

ग़िला

उसके नज़दीक ग़मे तर्के वफ़ा कुछ भी नहीं
मुतमईन है वो यूँ जैसे के हुआ कुछ भी नहीं

अब तो हाथों की लकीरें भी मिटी जाती हैं 
उसको खो कर तो मेरे पास रहा कुछ भी नहीं 

कल बिछड़ना है तो ये सोच के करना अहदे वफ़ा
अभी आग़ाज़े मोहब्बत है अभी हुआ कुछ भी नहीं

मैं तो इस वास्ते चुप हूँ के तमाशा न बने
तू समझता है मुझे तुझसे ग़िला कुछ भी नहीं।

                                                     (अज्ञात ) 

No comments:

Post a Comment

निर्भय

तुलसी भरोसे राम के निर्भय हो के सोय  अनहोनी होनी नहीं होनी होय सो होय ।                                      तुलसीदास जी